क्यो होता है दिल को इन्तेज़ार किसिका हरपल..?
क्यो दिखता है सपना आँखो मे हरपल..?

क्यो लगता है तनहा बेकरार हमे इतना..?
क्यो ढलते ही दिन याद आता है तू इतना..?

क्यो बुझता है दिया जल जल के ऐसे..?
क्यो आता है प्यार जब तड़पता तू ऐसा..?

क्यो है भरोसा मुज़से भी तुज़पे ज़्यादा..?
क्यो आता है याद किसीसे तू ज़्यादा..?

क्यो जाता है चाँद छोड़ तारों को अकेला..?
क्यो बनता है चाँद कर मुझे तू अकेला..?

क्यो तड़पति है साँसे अकेलेंमे इतनी..?
क्यो डगमगाती है राहे जब आंस हो इतनी..???


साभार आणि कवियेत्री
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